Sunday, April 16, 2006

एहसास

कभी पानी की बूँद से पुछा,
कि भीगना कैसा लगता है?

कभी हवा के झोंके से पुछा,
कि चंचल होना कैसा लगता है?

कभी खिलते हुए फूल से पुछा
कि सुन्दर दिखना कैसा लगता है?

कभी सूरज की किरणों से पुछा
कि दमकना कैसा लगता है?

कभी कोयले के टुकड़ों से पुछा,
कि आग में जलना कैसा लगता है?

कभी निर्भाव समय के क्षण से पुछा,
कि चलना कैसा लगता है?

कभी चेतना से पुछा,
कि इंसान होना कैसा लगता है?

कभी सोचा की जो अवचेतन है वह अनमोल है,
तो जो चेतन होगा उसका क्या मोल होगा?

कभी पुछा, तो क्यूँ नहीं पुछा?
कभी सोचा, तो क्यूँ नहीं सोचा?

क्यूँ इंसान होने की गरिमा को खो दिया,
क्यूँ अपने ही भीतर के इंसान को मार दिया.

Written on: Jan 26th 2006

REDISCOVERY

In one nice morning,
I saw rays peeping at me
through my window,
I could see their purity,
I could feel their warmth,
I could smell their fragrance,
I could touch their gentle soul,
I could hear their footsteps,
I could taste their sweetness,
Then,
I asked myself
Where was this purity, this warmth,
this fragrance, this gentle soul,
these footsteps and this sweetness,
when I needed them the most.

A voice came from inside,
I was there, I was there,
I was there, I was there,
It's you who made effort,
to see me, to feel me,
to smell me, to touch me,
to hear me, and to taste me.

Written on: Sept 8th 2001

Saturday, April 15, 2006

चले गए

जब ज़िन्दगी से कुछ पलों को चुराना चाहा,
वो हाथों से रेत की तरह फिसलते चले गए.

जब सितारों को मुठ्ठी में कैद करना चाहा,
वो बादलों के पीछे छुपते चले गए.

हमने जो वादे किये थे मिलते रहने के कभी,
वोह रिश्ते टूट कर बिखरते चले गए.

दोस्ती का वास्ता दे कर जो गले मिलते थे कभी,
हर घूंट में ज़हर वोह मिलते चले गए.

बिछरने के ख़याल से जो डरते थे कभी,
झटक के दामन चलते चले गए.

अपने बिना ज़िन्दगी अधूरी थी जिनकी,
हर उस ख़याल से वो हमको मिटाते चले गए.

गए थे यूँ की वापस कभी ना आयेंगे,
यादों के दरिया में उतने ही घुलते चले गए.

अब आलम है यह इस दिल का,
उसकी यादों की शम्मा को हम आंसुओं से बुझाते चले गए.

अब अगर आओगे तो मिल भी ना पायेंगे,
तुम्हारे हाल को देख कर कुछ कह भी ना पाएँगे,
अब आदत हो चुकी है तुम्हे सिर्फ ख्वाब में देखने की,
ख्यालों के बुत को हक़ीकत ना बना पायेंगे,

अब के मुड़ कर जो कभी आये ए दोस्त,
तेरी दोस्ती की कसम,
ख़त्म कर के खुद को फिर से चोट खाने से मुकर जायेंगे....

Written on: Sept. 25th 2004

Thursday, April 06, 2006

Whats Life all about??

Have you ever seen the autumn leaves turn from green to gold,
A carefree flower bursting with flaming colours & exotic perfume,
Burn and die in golden sunlight,
That's what life is all about,
With a smile on your lips and a prayer in your heart,
If you truely love me, you'll set me free.


Have you ever thought of people who burn their candles at both ends,
They know it's time to go, they will not last the night,
But as they burnt themselves, they gives a lovely light,
Leaving their footprints on sands of time,
That's what life is all about,
With a smile on your lips and a prayer in your heart,
If you truely love me, you'll set me free.


Have you ever looked into a mirror,
You will see a face you know,
It's the one you love the most, in happiness and pain,
The reflection will always be there,
But then you look into it again, it's still you,Or you think it is you,
It's not clear, you freeze with fright, you sweat, you tremble,
You wonder,"why can't I see myself, the way world sees me,
the way I always did, Is my reflection not me?
I wish I could clearly see,Is this the will of God, if so, then let it be"
That's what life is all about,
With a smile on your lips and a prayer in your heart,
If you truely love me, you'll set me free.

Wednesday, April 05, 2006

कहानी

उलझे मन की उलझी कहानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

चलते हैं दिशाहीन,
चलते हैं ध्वनिहीन,
रास्ता क्या है गहरा पानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

जीवन कोई सौगात नहीं है,
अपनी कोई औकात नहीं है,
फिर भी इसकी कीमत है चुकानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

रिश्तों की ये माया नगरी,
माया नहीं है जादू नगरी,
कभी नयी तो कभी पुरानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

जाना थे उस शिखर के आगे,
अब जब पाँव उधर हैं भागे,
मंजिल करने लगी मन मानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

शब्दों के इस फेर जाल में,
अपने जीवन के मरण काल में,
पाने खोने की ईच्छा है मिटानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

उलझन उलझी सी, उलझी उलझन से,
हुई ख़त्म हुई शुरू जहां से,
उलझे मन की उलझी कहानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

Written on: Apr 24th 2004

अंतराग्नी

नहीं पता था मेरे ही अंतर से एक दिन जागोगी तुम,
मेरे भावों का दर्पण बन, एक दिन बाहर आओगी तुम.

तुम से मेरे रिश्ते की तो कोई बात कभी नहीं थी,
मुझसे मेरा सब कुछ लेकर, अपना अस्तित्व बनोगी तुम.

मेरे अंध तमस में एक दिन आशा का दीप जलोगी तुम,
आँखों के टूटे मोती से मेरी, स्वर्ण हार बनोगी तुम.

मेरे उर के कोलाहल को रचना का रूप दिलोगी तुम,
मेरे अंतर के विष को अमृत का स्रोत बनोगी तुम.

Written On: May 15th 2004

THOUGHTS

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Collection of my poems
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