Tuesday, June 07, 2011

बूँदें

पानी के आइने में वो आसमान से झाकता नज़र आया,
मेरी खिड़की से मेरे लॉन की सुखी घास पे सोता नज़र आया,
और हमें पता था की चहरे बदलना सिर्फ चाँद को आता है|

कुछ पत्ते जो शाख से टूट कर हवा के साथ बह चले,
तो लगा की दोस्ती का फ़र्ज़ निबा रहे हैं,
कुछ यादें उम्र भर लम्हों का साथ नहीं छोड़तीं|

रात जो बुझा दी मैंने,
यादें भी राख में दफ्न हो गयीं,
न जाने इस सयियारे ने ये बर्फ की चादर क्यूँ ओढ़ ली|

एक एक ब्रुश का स्ट्रोक याद था मुझे,
तुमने बड़े जतन से उस में रंग भरा था,
पानी ही तो था आँख का, न जाने कब कैनवास गीला कर गया|

written on: April 17th 2011

Inspired by Gulzar Sahab

In Triveni style-
चंद भूले हुए से नाम जो याद आ जाएँ  
तो जी भर सा जाता है
जुबान कभी दाँत से कट भी जाया करती है !!
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"Triveni" is a form of Hindi/Urdu poetry initiated by the  Gulzar Sahab. Unlike sher, a triveni consists of three misras. The first two are complete in themselves, but the addition of the third misra gives a new dimension all together.

written on: Mar 23th 2011

वोह जब याद आये, बहुत याद आये

अंजान से रास्ते पे, बढ़ चले हैं कदम,
हर तरफ अजनबीयों से घिरे हुए हैं हम.

रंग मिट्टी का ही नहीं, आसमान का भी बदला है,
हर चेहरे में जाना सा कोई चेहरा आँखों ने बनाया है.

पर फिर भी सुकून है दिल को, इस बदले हुए आसमान को देख कर,
मेरी खिड़की से दिखता वो तारा, यहाँ भी मेरे साथ चला आया है!!!

written on: Feb 28th 2011