About Me

I love life, and am proud to be the most wonderful creation of God. You got it, "HUMAN BEING". Had I been a flower, fish or a bird, I must not been writing this......

Tuesday, September 17, 2013

उलझने

मेरे दिल के शीशे में एक अक्स  रूक गया है,
कुछ तो है जो कहीं अटक गया है,
क्या करूँ? इन जस्बातों के दरिया को कहाँ मोडूं?

मसरूफ है दिल रगों में खून पोहचाने के लिए,
मगर लगता है धड़कन तो बहुत पहले ही बंद हो चुकी है,
क्या करूँ ? इन लम्हों की कसक कहाँ महसूस करूँ?

बाहर बारिशें हैं और अन्दर है पतझड़ का मौसम,
लम्हे सूखे पत्तों से टूट टूट कर हवा में उड़ रहे हैं,
क्या करूँ? बूंदों को अन्दर आने दूँ या कुछ हरे ज़ख्मों को अभी भर जाने दूँ ?

यादों के दरीचों से झाँक के देखो,
नखरों का सिलसिला अभी भी बाकी है क्या,
क्या करूँ? तौल के देखूं कुछ कम हुआ या ज्यादा?

कुछ दिन पहले ही किसी ने दस्तक दी है,
मेरे दिल के शीशे को पोंछने की कोशिश की है,
क्या करूँ? नयी उम्मीद का गृहप्रवेश या पुरानी यादों का जनाज़ा ?