आज बहुत दिन बाद
जब कमरा खोला
तो देखा कुछ
उथल-पुथल मची हुई थी
कुछ धूल, कुछ शोर
और कुछ पुरानी बातें
बिखरी हुई थी
मेरी नज़र गयी
उस एक कोने पे जो खली था
एक लम्हा
नज़र झुकाए बैठा हुआ था
उसने जो
मेरी ओर नज़र उठाई
तो माज़ी के
कुछ लम्हों की चीखें सुनाई दीं
मैंने उस लम्हे को बरसों पहले
इस कमरे में कैद किया था
और सफ़ेद चादर से
ढक दिया था
आज भी वो लम्हा
वहीं था
बस चादर का रंग
कुछ सुर्ख लाल पड़ चुका था........
written on: Jan 30th 2011
जब कमरा खोला
तो देखा कुछ
उथल-पुथल मची हुई थी
कुछ धूल, कुछ शोर
और कुछ पुरानी बातें
बिखरी हुई थी
मेरी नज़र गयी
उस एक कोने पे जो खली था
एक लम्हा
नज़र झुकाए बैठा हुआ था
उसने जो
मेरी ओर नज़र उठाई
तो माज़ी के
कुछ लम्हों की चीखें सुनाई दीं
मैंने उस लम्हे को बरसों पहले
इस कमरे में कैद किया था
और सफ़ेद चादर से
ढक दिया था
आज भी वो लम्हा
वहीं था
बस चादर का रंग
कुछ सुर्ख लाल पड़ चुका था........
written on: Jan 30th 2011