कभी मोर की,
कभी खरगोश की,
रोटी बनाती थीं,
कभी खरगोश की,
रोटी बनाती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
नींद में
प्यार से निवाले खिलातीं थीं
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
छुपन-छुपाई के खेल में,
अपने आँचल में छुपा लेती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
जब पक जाते थे मेरे कान,
सोने के बुन्दों से,
चंदा कह के,
चांदी की बाली पहनाती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
मोम से,
प्यार से निवाले खिलातीं थीं
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
छुपन-छुपाई के खेल में,
अपने आँचल में छुपा लेती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
जब पक जाते थे मेरे कान,
सोने के बुन्दों से,
चंदा कह के,
चांदी की बाली पहनाती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
मोम से,
अपनी फटी एड़ियाँ भरती थीं,
लेकिन,
मेरे चहरे पे मलाई लगाती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
जब बुरे सपने से उचटती थी नींद मेरी,
जब बुरे सपने से उचटती थी नींद मेरी,
मुट्ठी के नमक से मेरा डर घुलवाती थीं,
माँ! तुम कितना मुझे बहलाती थीं.
कहते सुना था मैंने तुमको,
सुबह के सपने सच होते हैं,
मैंने देखा खुदको तुम्हारे आँचल में दुबके,
माँ! क्या अब भी बहलाती हो मुझको ?
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