यादों की बूंदों से,
हर दिन भिगोते हैं खुद को जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?
आड़ी तिरछी लकीरों से,
नगमें लिखते हैं जब,
..............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?
तस्वीरों से नहीं,
आईने में देख कर, तुमसे बातें करते हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?
सिवई जैसी,
छोटी-छोटी सांसें भरतें हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?
पैचवर्क के तकिये में,
मुंह छुपाते हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?
लच्छेदार बातों के बीच,
गोल-गोल रोटी की लोई घुमाते हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?
रहने दो वो मज़ाक की बातें,
ज़िन्दगी मज़ाक बन गयी है अब,
कुछ याद नहीं आता है तुम्हें .........
No comments:
Post a Comment