Wednesday, May 28, 2014

कुछ नयापन लाओ

कुछ नयापन लाओ.… जाने क्यों दरिया जैसे सरकते रहते हो
कुछ नयापन लाओ.… ज़रा तूफ़ान के जैसे उछलोगरजो, आँखें दिखाओ। 

कुछ नयापन लाओ.… जाने क्यों अँधेरे  हालात में दिल जलाते हो
कुछ नयापन लाओ.… ज़रा नए सूरज से काजल चुराओ, आखें चमकाओ। 

कुछ नयापन लाओ.… जाने क्यों बुढ़िया की गठरी में दो सिक्कों जैसे छुपते हो
कुछ नयापन लाओ.… ज़रा सोने- चांदी की गिन्नी खनकाओ। 

कुछ नयापन लाओ.… जाने क्यों शराफत की चादर लपेटे हो
कुछ नयापन लाओ.… कुछ  बड़ी, नयी, शातिर तरकीब दिखलाओ।  

कुछ नयापन लाओ.… जैसे हो उतना बने रहने में क्या है
कुछ नयापन लाओ.… ज़रा कायदे की हदें पार करो, रॉबिनहुड बन जाओ।  

Sunday, October 13, 2013

Happy Birthday

Loose ends of strings are floating in "void"
With these open ends,

Dear Void,
I wish you many years of existence..........




Tuesday, September 17, 2013

उलझने

मेरे दिल के शीशे में एक अक्स  रूक गया है,
कुछ तो है जो कहीं अटक गया है,
क्या करूँ? इन जस्बातों के दरिया को कहाँ मोडूं?

मसरूफ है दिल रगों में खून पोहचाने के लिए,
मगर लगता है धड़कन तो बहुत पहले ही बंद हो चुकी है,
क्या करूँ ? इन लम्हों की कसक कहाँ महसूस करूँ?

बाहर बारिशें हैं और अन्दर है पतझड़ का मौसम,
लम्हे सूखे पत्तों से टूट टूट कर हवा में उड़ रहे हैं,
क्या करूँ? बूंदों को अन्दर आने दूँ या कुछ हरे ज़ख्मों को अभी भर जाने दूँ ?

यादों के दरीचों से झाँक के देखो,
नखरों का सिलसिला अभी भी बाकी है क्या,
क्या करूँ? तौल के देखूं कुछ कम हुआ या ज्यादा?

कुछ दिन पहले ही किसी ने दस्तक दी है,
मेरे दिल के शीशे को पोंछने की कोशिश की है,
क्या करूँ? नयी उम्मीद का गृहप्रवेश या पुरानी यादों का जनाज़ा ?

Friday, February 08, 2013

क्या कुछ याद है तुम्हे


यादों की बूंदों से,
हर दिन भिगोते हैं खुद को जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?

आड़ी तिरछी लकीरों से,
नगमें लिखते हैं जब,
..............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?

तस्वीरों से नहीं,
आईने में देख कर, तुमसे बातें करते हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?

सिवई जैसी,
छोटी-छोटी सांसें भरतें हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?

पैचवर्क के तकिये में,
मुंह छुपाते हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?

लच्छेदार बातों के बीच,
गोल-गोल रोटी की लोई घुमाते हैं जब,
...............क्या कुछ याद आता है तुम्हे?

रहने दो वो मज़ाक की बातें,
ज़िन्दगी मज़ाक बन गयी है अब,
कुछ याद नहीं आता है तुम्हें .........