Tuesday, June 07, 2011

बूँदें

पानी के आइने में वो आसमान से झाकता नज़र आया,
मेरी खिड़की से मेरे लॉन की सुखी घास पे सोता नज़र आया,
और हमें पता था की चहरे बदलना सिर्फ चाँद को आता है|

कुछ पत्ते जो शाख से टूट कर हवा के साथ बह चले,
तो लगा की दोस्ती का फ़र्ज़ निबा रहे हैं,
कुछ यादें उम्र भर लम्हों का साथ नहीं छोड़तीं|

रात जो बुझा दी मैंने,
यादें भी राख में दफ्न हो गयीं,
न जाने इस सयियारे ने ये बर्फ की चादर क्यूँ ओढ़ ली|

एक एक ब्रुश का स्ट्रोक याद था मुझे,
तुमने बड़े जतन से उस में रंग भरा था,
पानी ही तो था आँख का, न जाने कब कैनवास गीला कर गया|

written on: April 17th 2011

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