Wednesday, July 18, 2012

मुख़तसर

बातों का सिलसिला जारी रहा... 
वो ही मिलने की बेकरारी,
वो ही बातों की खुमारी..
वो ही बेइन्तेहा मुहब्बत का इकरार,
और सुर्ख यादों की चादर पे तेरा इंतज़ार..
 तुझको ढूंढा नहीं है यादों में,
तुझको पाया है सिर्फ आंसुओं में...
फर्क सिर्फ इतना है की
अब.... 
बातों का सिलसिला, 
सिर्फ खुद से ही जारी है