नहीं पता था मेरे ही अंतर से एक दिन जागोगी तुम,
मेरे भावों का दर्पण बन, एक दिन बाहर आओगी तुम.
तुम से मेरे रिश्ते की तो कोई बात कभी नहीं थी,
मुझसे मेरा सब कुछ लेकर, अपना अस्तित्व बनोगी तुम.
मेरे अंध तमस में एक दिन आशा का दीप जलोगी तुम,
आँखों के टूटे मोती से मेरी, स्वर्ण हार बनोगी तुम.
मेरे उर के कोलाहल को रचना का रूप दिलोगी तुम,
मेरे अंतर के विष को अमृत का स्रोत बनोगी तुम.
Written On: May 15th 2004
मेरे भावों का दर्पण बन, एक दिन बाहर आओगी तुम.
तुम से मेरे रिश्ते की तो कोई बात कभी नहीं थी,
मुझसे मेरा सब कुछ लेकर, अपना अस्तित्व बनोगी तुम.
मेरे अंध तमस में एक दिन आशा का दीप जलोगी तुम,
आँखों के टूटे मोती से मेरी, स्वर्ण हार बनोगी तुम.
मेरे उर के कोलाहल को रचना का रूप दिलोगी तुम,
मेरे अंतर के विष को अमृत का स्रोत बनोगी तुम.
Written On: May 15th 2004
1 comment:
सुंदर! कितनी सहज रचना है..
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