Wednesday, April 05, 2006

कहानी

उलझे मन की उलझी कहानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

चलते हैं दिशाहीन,
चलते हैं ध्वनिहीन,
रास्ता क्या है गहरा पानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

जीवन कोई सौगात नहीं है,
अपनी कोई औकात नहीं है,
फिर भी इसकी कीमत है चुकानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

रिश्तों की ये माया नगरी,
माया नहीं है जादू नगरी,
कभी नयी तो कभी पुरानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

जाना थे उस शिखर के आगे,
अब जब पाँव उधर हैं भागे,
मंजिल करने लगी मन मानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

शब्दों के इस फेर जाल में,
अपने जीवन के मरण काल में,
पाने खोने की ईच्छा है मिटानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

उलझन उलझी सी, उलझी उलझन से,
हुई ख़त्म हुई शुरू जहां से,
उलझे मन की उलझी कहानी,
बड़ा सा दाग़ एक यही निशानी.

Written on: Apr 24th 2004

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