Saturday, April 15, 2006

चले गए

जब ज़िन्दगी से कुछ पलों को चुराना चाहा,
वो हाथों से रेत की तरह फिसलते चले गए.

जब सितारों को मुठ्ठी में कैद करना चाहा,
वो बादलों के पीछे छुपते चले गए.

हमने जो वादे किये थे मिलते रहने के कभी,
वोह रिश्ते टूट कर बिखरते चले गए.

दोस्ती का वास्ता दे कर जो गले मिलते थे कभी,
हर घूंट में ज़हर वोह मिलते चले गए.

बिछरने के ख़याल से जो डरते थे कभी,
झटक के दामन चलते चले गए.

अपने बिना ज़िन्दगी अधूरी थी जिनकी,
हर उस ख़याल से वो हमको मिटाते चले गए.

गए थे यूँ की वापस कभी ना आयेंगे,
यादों के दरिया में उतने ही घुलते चले गए.

अब आलम है यह इस दिल का,
उसकी यादों की शम्मा को हम आंसुओं से बुझाते चले गए.

अब अगर आओगे तो मिल भी ना पायेंगे,
तुम्हारे हाल को देख कर कुछ कह भी ना पाएँगे,
अब आदत हो चुकी है तुम्हे सिर्फ ख्वाब में देखने की,
ख्यालों के बुत को हक़ीकत ना बना पायेंगे,

अब के मुड़ कर जो कभी आये ए दोस्त,
तेरी दोस्ती की कसम,
ख़त्म कर के खुद को फिर से चोट खाने से मुकर जायेंगे....

Written on: Sept. 25th 2004

1 comment:

Shreyansh said...

Wow!!
This place is getting better day by day.
Bott achcha likha hai!!