Sunday, April 16, 2006

एहसास

कभी पानी की बूँद से पुछा,
कि भीगना कैसा लगता है?

कभी हवा के झोंके से पुछा,
कि चंचल होना कैसा लगता है?

कभी खिलते हुए फूल से पुछा
कि सुन्दर दिखना कैसा लगता है?

कभी सूरज की किरणों से पुछा
कि दमकना कैसा लगता है?

कभी कोयले के टुकड़ों से पुछा,
कि आग में जलना कैसा लगता है?

कभी निर्भाव समय के क्षण से पुछा,
कि चलना कैसा लगता है?

कभी चेतना से पुछा,
कि इंसान होना कैसा लगता है?

कभी सोचा की जो अवचेतन है वह अनमोल है,
तो जो चेतन होगा उसका क्या मोल होगा?

कभी पुछा, तो क्यूँ नहीं पुछा?
कभी सोचा, तो क्यूँ नहीं सोचा?

क्यूँ इंसान होने की गरिमा को खो दिया,
क्यूँ अपने ही भीतर के इंसान को मार दिया.

Written on: Jan 26th 2006

No comments: